दिवस और जीवन।
एक दिवस सा है ये जीवन
एक दिवस सा है ये जीवन
लालिमा लिए सूर्योदय का अम्बर
जैसे नवजीवन का सृजन सुंदर।
गुनगुनी धूप भोर की,खिलाएं नन्ही कलियां
जैसे मदमस्त बचपन, करे आंगन में अटखेलियाँ।
अपरान्ह में दिनकर का ऊंचा,सशक्त आसन
मानो उत्तरदायित्व से पूर्ण हो युवा का यौवन।
ढ़लती धूप संध्या की, दिवस भर का दृश्य आँचल में लिये
यू लगे कोई अधेड़ खड़ा हो जीवन का अनुभव लिए।
पूर्ण होता दिवस साथ लाये तमस भरी निशा
जैसे अंधेरा, शाश्वत सत्य का, करे मनुज रूप से विदा।
बस इसिलिए एक दिवस सा ही है ये जीवन।
भवसागर में डूबता - तैरता मानव का मन।
रुचि 🙏
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