न जाने बीते दिनों में मन के शब्दों को आकार देने की चाह कहाँ थी उकेर सके जो भावनाओं को ऐसी चटक स्याह कहाँ थी दबे पांव सरकता दिसंबर झकझोर गया मुझे, मेरे मन का समंदर जो वादे किए थे खुद से, क्या पूरे कर पाए जो बदलाव था लाना खुद में, क्या हम ले आये! साधारण से, इन जटिल प्रश्नों का, जवाब रहकर भी हम लाजवाब हो गए अपनी ही निगाहों में न जाने, किस तरह बेनकाब हो गए। उम्मीद करते हैं हर साल ,कि जमाना बदल जाये खुद से ही शुरुआत हो, न जाने वो साल कब आये। अपराधी समय से हमेशा करते हैं शिकायतें जो उसने हमें दिया है उस पर कभी नजर भी नही डालते। बदलते हैं कलेंडर हर साल पर बदल नही पाते हैं हम खुद का हाल। जो सोचा उस पर चल पड़े अगर, तो समाज की पीढ़ी को एक ठोस राह मिल जाये हर किसी को अपने सपने का उचित आकार मिल जाये। तो, न बदलेंगे सिर्फ कलेंडर अब हम, बदलना चाहिए जिंदगी की राह में हर कदम। Happy New Year RAJ
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