रिश्ता: लेखक और पाठक का।
रिश्ता,
लेखक और पाठक का जैसे
प्रेषक और गृहीता का।
दोनों पक्षों का बंधन है अटूट
परस्पर समर्पित रिश्ता अचूक।
भावनाओं को शब्द देता लेखक
प्रोत्साहन से संवारता उसे पाठक।
जैसे बचपन को निहाल करता ममत्व है
वैसे ही लेखक को सहेजता, पाठक है।
निरंतरता बनाए रखने को ,
सुघड़ रचनाएं रचने को,
लेखक के लिए अपूर्ण होती है स्याह
उसे पूर्णता देती है, प्रोत्साहकों की वाह।
पाठक बिन लेखक निराधार।
लेखक बिन पाठक बेकार।
पूरक रिश्ता दोनों का
अनवरत बना रहे यह संचार।
आज समर्पित है हृदयतल से
उन्हें मेरी ये पंक्तियां।
जिन्होंने मुझे, निश्छल मन से,
सदैव दीं है शाबासियां।
मन ने कहा,मेरे मुझसे
क्यों नही लिखती बारे में उनके।
जिनके प्रोत्साहन रूपी आभूषण से
सजता तुम्हारा मन "लेखन" से।
आप "श्री" का वंदन है
करते जो मेरी कृतियों का पठन हैं।
मेरी रचना की बगिया खिलती रहे।
आपकी प्रशंसा भरी पंक्तियां, हमेशा मिलती रहे।
अभिवादन
रुचि 🙏
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