मूर्तिकार

तुम हो मूर्तिकार, तुम ही तो हो मूर्तिकार
जग में अनूठे रचनाकार।

मिट्टी की मूरत बनाकर,
 सजीव बनाते उसकी सूरत सजाकर
तुम एक प्रादर्श हो, 
जैसे हो सृष्टि का रचनाकार,
तुम ही तो हो मूर्तिकार।

कण-कण को कण से मिलाकर
स्वरूप देते उन्हें
तुम अपने सद्भाव मिलाकर
तुम एक रचियता हो,
देते हो रज को आकार।
तुम ही तो हो मूर्तिकार।

न धर्म का पाश, 
न जाति का बंधन
तुम फैलाते अपनी कला का चंदन
अपने नयनों का स्वप्न करते
स्वयं के कर से साकार
तुम ही तो हो मूर्तिकार।

राम, सिया,हनुमत, भोले,
राधा, कृष्ण या शिर्डी के सांई
तुम गढ़ लेते अष्टभुजी महामाई,
गांधी,नेहरू हो या विवेकानंद
तुम गढ़ लेते ईसा मसीह या परमहंस।
तुम तो सगुण के साकार
तुम ही तो हो मूर्तिकार।

करते समर्पित अपनी कलात्मक दृष्टि
जैसे रची हो,मनोरम सृष्टि
मूक मूर्ति बोलती है,आंखों से
जिसे सजाते हो तुम
अपने सृजनशील हाथों से।
एक वो है, सृष्टि का रचनाकार
एक तुम हो,प्रतिमाकार।
तुम ही तो हो मूर्तिकार
तुम ही तो हो मूर्तिकार।



RAJ 



Comments

Popular posts from this blog

नया साल और हम

NATIONAL SCIENCE DAY

गणतंत्र दिवस