इश्क......
उनकी निगाहों में अक्स खुद का ढूंढना क्यूं
अपनी निगाहों में उनकी शख्सियत दिखाओ ना
उनकी करीबी की तलब में खुद मचलना क्यूं
उन्हीं को खुद का तलबगार बनाओ ना
गर मुहब्बत है उनसे,तो फिर शिकायत कैसी
शिकायत है उनसे तो मुहब्बत कैसी।
लाजिमी ही होगा उनके दर को खटखटा देना
क्यूंकि रुकता ही नहीं खुद के ख्वाबों में उनका चले आना
जिसकी वजह से तड़पता है दिल ये मासूम सा।
वो खुद ही छिपा बैठा है दिल में अनजान सा।
तड़पना कैसा ,गर वो तुमसे हैं दूर
उन्हें करीब आने को मजबूर बनाओ ना।
इश्क करना ही क्यों, बेदर्द जमाने में,
इश्क किया है तो निभाओ ना।
रुचि 💞
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