दृश्य......
ये कैसा दृश्य है,
अस्वीकारणीय परिदृश्य है।
जिसके चहकने से भोर होती है
वो कलरव आज चिरनिद्रा में लीन है।
जिसके रंग से बगिया सजती है
वो आज रक्तिम,किंतु रंगहीन है।
ये कैसा दृश्य है......
यही तुम्हारी नियति है,या
स्वार्थी मानव की घृणित कृति है?
न जाने क्यूं तुम शांत हो?
मेरे हृदय की विचलित गति है।
ये कैसा दृश्य है.........
तिनकों से जोड़कर जो बनाया था जो घोंसला
वो तुम्हारे नन्हें मुन्नों को दे रहा है हौसला,
प्रकृति जितनी मेरी उतनी ही तुम्हारी भी थी
न जाने इस समझ से मानव की नही प्रीति थी
ये कैसा दृश्य है.......
अपलक निहार रही तुम्हारी आंखों को
क्या कहेंगी अब आंखें मेरी!
स्पंदन तुम्हारा थमा है,
क्रंदन कर रही है सांसे मेरी!
ये कैसा दृश्य है.....
यूं तो हमारा संवाद न हुआ कभी,
किंतु "निशब्द" तुम, शब्दों का भंडार हो
यही वचन देते है तुम्हें अभी,
पुनः ना ये निंदनीय कार्य हो।
ये कैसा दृश्य है
अस्वीकारणीय परिदृश्य है।
RAJ
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