इक्कीसवीं सदी और बिखरते रिश्ते

इक्कीसवीं सदी,
प्रगति और उन्मुक्तता की द्योतक है। 
प्रगति पथ पर अग्रसर होने के बाद भी रिश्तों के मार्ग पर 
कहीं न कहीं पिछड़ती हुई ये सदी। गुहार कर रही कि गीली मुट्ठी से फिसलते रिश्तों को संभाल लो मनुज।
न संभाल पाए तो मानवता पराजित हो जाएगी।
आज स्वयं से प्रारंभ होकर स्वयं में ही खो जाने वाली पीढ़ी का मूक दर्शक बन गई हूं मैं।
हां इक्कीसवीं सदी हूं मैं, आधुनिकता को संजोती मगर खोखले रिश्तों की तिजोरी बन गई हूं मैं।

आज का वक्त हर मनुष्य से यही पूछ रहा कि रिश्तों के अधूरेपन का हवाला देते मानव से आखिर रिश्तों में ये फीकापन आया कहां से?
भारत जैसे देश में रहने वाले हम भारतीय
अतिथि सत्कार के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हम आज अपनों के ही सत्कार में पीछे जाने लगे। आखिर क्या कारण है?
कोई कहता है टूटते संयुक्त परिवार,
कोई कहता है आजीविका के लिए भागता परिवार
मेरा कहना है परिस्थिति चाहे जो हो 
दूरी कितनी भी क्यों न हो, अपनत्व की कमी ही एकमात्र कारण है रिश्तों के बिखराव का।
टूटते वैवाहिक बंधन की अगर बात करें तो जहां केवल दंपत्ति को ही एक दूसरे को संभालना, मिलकर नवीन संसार संवारना है वे स्वयं ही अपनत्व की डोर में बंध नही पाते। परिणाम स्वरूप परिवार के अन्य रिश्ते भी बिखर जाते हैं।
इस तरह प्रारंभ से ही रिश्तों में अनबन, परायापन और परिणाम  संबंध - विच्छेद।
कारण : इन अजन्मे ही मृतप्राय रिश्तों का क्या कारण हो सकता है, मेरी मति बहुत अधिक तो चल नही पा रही,
परंतु सहनशीलता तथा अपनत्व का अभाव ही इसकी जड़ में दिखाई देता है।  पौरुष बचपन से देखता है पिता या दादा को पत्नी पर रॉब जमाते हुए। और स्त्रीत्व ने देखा है हर कदम पर मां का तिरस्कार और अपमान।
इन दोनो ही परिस्थितियों में आगामी रिश्ते की प्रबलता की सभावना कम ही दृष्टिगोचर होती है।
क्योंकि स्त्रीपक्ष ने  ठान रखा है तिरस्कार सहन नही करना है, पौरुष अपना प्रभुत्व त्यागने तैयार नहीं।
बस यही "अहम" उन्हे "हम" नही बनने देता।  शिक्षा दी जाती है जीवन की परिस्थितियों में उसे कवच की तरह उपयोग करने के लिए और वो रूप ले लेती है रिश्तों को तोड़ने के हथियार का।
बस इक्कीसवीं सदी का यही रूप दिखता है मुझे।
उपाय  :- समस्या का समाधान समस्या के साथ ही निर्मित होता है। मानव रचित समस्या है तो समाधान भी मानव ही ढूंढ निकालेगा। बचपन से ही स्त्री -पुरुष समानता, सामंजस्य निर्मिति तथा एकाकी जीवन का दुष्पपरिणाम बताया जाय तो संभवतः कुछ सुधार हो सकता है। यह दायित्व निश्चित तौर पर अभिभावकों का ही होगा। इस हेतु कार्यशालाएं भी की जानी चाहिए।
जितने उत्साह से बच्चो को ओलंपियाड की परीक्षा में सम्मिलित कराते हैं उतने ही उत्साह से सामाजिक कार्यक्रमों में लेकर जाना चाहिए। जुड़ाव निर्माण होना चाहिए।
अगर इस दिशा में अब भी गंभीरता से विचार न किया गया तो भावी पीढ़ी इसका  दुष्परिणाम भुगतेगी।
संबंधों का विच्छेद ......
बस अब और नही......,🙏

Comments

Popular posts from this blog

नया साल और हम

NATIONAL SCIENCE DAY

गणतंत्र दिवस