उन्मुक्त पंछी और मानव

आज एक मानव के हाथों
कुछ पंछियों को बिकते देखा।
न जाने क्या सही क्या गलत सा देखा।
पंछियों को बिकते देखा।

उन्मुक्त जिन्हें उड़ना था,
पिंजरे में उन्हें  कैद देखा।
संजो कर पाला था जिसने
उसी के हाथो उन्हे बिकते देखा।

अपने बच्चों की खिलखिलाहट सुनने को
उन मासूमों की कलरव को बिकते देखा।
जिन्हें बुनना था अपना आशियाना 
उन्हे सलाखों में बंद हो, ठिकाना बदलते देखा।

न जाने किसने दिया  ये अधिकार 
तुम्हें ओ मानव! 
प्रकृति के नियमो का करते प्रतिकार देखा।
आज एक मानव के हाथों
पंछियों को बिकते देखा।

सर्जनशील हो तुम, शोधकर्ता हो तुम,
ढूंढ लो कोई और मार्ग,अपनी आजीविका का
क्यूं बने हो उदाहरण, स्वार्थपरता का।
आज एक मानव के हाथों
पंछियों को बिकते देखा।





RAJ.🙏


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