अश्रु या नीर!
जल की बूंदें; यूं तो रूप एक
किंतु उनके प्रभाव अनेक
प्रवाहित होता जो तोड़कर
मानव हृदय के भावों की प्राचीर,
कभी बनता "अश्रुधारा" वो,
तो कभी बने "नयन नीर"।
मनोकामना की पराजय,बने जिसका आधार,
जल की वो बूंद तो बने है "अश्रु धार"।
पर पीड़ा के लिए हो प्लावित
वह बने है "नयन का नीर"।
विह्वल राधा ने बहाए,
श्याम विरह में अश्रुधार
मीरा के नयनों से झर गए
मोहन भक्ति में नीर की धार।
विदा होती बिटिया पीहर की आस में
नैनों से बहाए अश्रूधार,
और पिता के नयन से झरते
स्वरक्तांश की विदाई में, नयन नीर अपरम्पार।
शिशु को प्रथमतः गोद में देखकर
ममत्व से निकल पड़े नीर की धार
शिशु रुदन में जो दिखे वो
लालसा की अश्रुधार।
सागर की हलचले अंतरिम
बनाती अनुपयोगी और युक्त लवण से
सरिताओं के साथ बहता नीर
शुद्ध और निश्चल, उनके समर्पण से।
जल की बूंदें नैनों से छलक जाती
कभी बन आंसू तो कभी बनती नीर।
रुचि
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