होली की बोली
टोली ही की होली है
या होली ही की टोली है
रंगों में डूबी हुई ये
होली की ही बोली है।
बृजरानी ढूंढे कान्हा को
होली में रंगने नन्द लाला को
हृदय बसे वो राधा के संग
रास रचाये,करे ठिठोली है
रंगों में डूबी हुई ये ,होली की ही बोली है।
पलाश का इठलाना
करता अभिनंदन फागुन का
ढोल नगाड़ों की गूंज संग जब
फाग छिड़े मतवालों का।
तब लगता है आई होली
पीले, नीले, लाल, गुलाबी,
अबीर से सजती, सबकी होली है
रंगों में डूबी हुई ये होली की ही बोली है।
गली मोहल्ले सूने लगते
होली के रंग अब फीके हैं
होटल, पब और बारों में धूम मचाती है
ये आधुनिकता की होली है
रंगों में डूबी हुई ये, होली की ही बोली है।
पूरनपोली और गुलगुलों में मिठास का
आभास अब कम सा होने लगा है
खील बताशों की थालियों का जुड़ाव
अब मिटने सा लगा है।
कोई डायबिटिक है तो कोई मन से ही विचलित है
स्वयं में स्वयं को ढूंढती ये होली है
रंगों में डूबी हुई ये होली की ही बोली है।
ऐ होलिका, तुम खुद संग जला लेना
काले रंग की छाया को
प्रह्लाद तुम,प्रकाशित करना सतरंगी उजालों को
होली की लकड़ी में जले सारी विपदा संसार की
बैर मिटे, मतभेद मिटे, रह जाय नेह निहालो की
प्रतिवर्ष रंग बदलती, ये रंगों में सराबोर होली है
रंगों में डूबी हुई ये होली की ही बोली है ।
Raj.
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