तेरी लेखनी हूँ मैं
जीवन के भाग-दौड़ में आज "लेखनी मेरी",
मुझे फिर याद आई।
उंगलियों में थाम उसे फिर से ,धीमी सी
इक मुस्कान सी आई।
पूछ लिया मैंने उससे,
आखिर क्या रिश्ता है हमारा,
जो तुम पुनश्च याद आ जाती हो,
कालचक्र कोई भी हो,
मेरी उंगलियां थाम जाती हो?
मधुर मुस्कान के साथ उत्तर मिला मुझे
जो भरपूर था हृदयतल को झंकृत कर देने,
वो सब कह गई लेखनी मुझे,
जो पूर्ण था किसी के अपनेपन को पूर्ण करने।
इठला कर बोली,मुझसे,
तेरी लेखनी हूँ मैं।
तेरे लिए बनी,
तुझ पर समर्पित,
तेरी ही कृति हूँ मैं।
तेरे स्वर रहित शब्दों को,
अभिव्यक्ति की स्वीकृति हूँ मैं।
तेरी लेखनी हूँ मैं।
पूछा मैंने कहाँ खो जाती हो
रह रह कर,
ढूँढती हूँ तुम्हें कई बार,
रह रह कर।
वो ठुमक कर बोल उठी
मैं कहाँ जाती हूं तुमसे दूर
तुम हो जाती है खुद से दूर
जीवन की आपा धापी में
स्वप्न संजोने की बैसाखी में
मुझसे दूर हो जाती हो
तुम ही कहीं खो जाती हो।
तुम्हारी हर भावना को स्वीकार करती मैं
उत्साहित मन को उसका स्वप्न-संसार देती मैं
व्याकुल हृदय को सुगंधित हार देती मैं
तम हो या प्रकाशपुंज, हर क्षण, साथ हूँ मैं,
तेरे निराकार भावों को शब्दों का आकार देती मैं।
तुझ पर समर्पित
तेरी ही लेखनी हु मैं
जिसकी न समाप्त होगी कभी स्याह है
सतत,निरंतर जिसकी जीवन राह है।
मैं वो साथ हूँ तेरा जो अटूट है
अजर और अमर है।
तुझे अंत तक जीवंत रखना ही
मेरे जीवन की चाह है।
तुझ से ही बनी
तुझ पर समर्पित
तेरी लेखनी हु मैं
तेरी लेखनी हु मैं।
रुचि
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