कैलेंडर .. बदल जाते हैं
दीवार पे टंगे कैलेंडर बदलते हैं
और लोग कहते हैं, साल बदल जाते हैं।
दीवार वहीं रह जाती है,
सिर्फ उसके साक्ष्य बदल जाते हैं
और लोग कहते हैं साल बदल जाते हैं।
चारदीवारी में कैद इसके पन्ने,
खुद में कैद कर लेते हैं
जीवन के अनमोल नगीने,
हर पल के साक्ष्य हो जाते हैं,ये,
तारीखों को बदलते -बदलते
खुद बदल जाते हैं
और लोग कहते हैं
"साल बदल जाते हैं"।
छोटी-छोटी स्मरणीय बातें
लिखा करते हैं इन पर हम,
बेबात ही बन जाते हैं ये
हमारे राज़दार , हर क्षण ,
स्मार्ट फ़ोन में उपलब्ध हैं
वो सारी तारीखें ,जो दीवार पे अब नही,
लेकिन वो बात उन तारीखों में, अब नही,
कैलेंडर बदलने वाले हाथ बदल जाते हैं
दीवार वही रह जाती है ,और लोग कहते हैं
साल बदल जाते हैं।
जीवन यथार्थ सिखलाते हैं
उपयोगी नहीं होने पर
रद्दी में बिक जाते हैं,
लेकिन अंत तक जीवन-लक्ष्य
निभा जाते हैं।
दिन और रात का दस्तूर वही रहता है
और हम जीवन मे आगे बढ़ते जाते हैं
हर साल कैलेंडर बदले जाते हैं, और लोग कहते हैं
साल बदल जाते हैं।
रुचि
Comments
Post a Comment