बदलता है ...क्या?
बदलती हैं तारीखें, बदल जाते हैं साल
क्या सचमुच बदलते हैं, हम सबके हाल,
घड़ी की सूइयां घूमती हैं, और
घड़ी थमी की थमी ही रह जाती है
बदलते जाते हैं साल, और
खुद को बदलने की बातें, बातें ही रह जाती हैं।
पलट जाते हैं पन्ने कैलेंडर के,
नहीं बदल पाते हाल मन के अंदर के,
क्या सचमुच बदलता है "वो"
जो बदलना चाहिए सचमुच में।
लोगों का पहनावा बदला,
बदल गया जीवन का ढंग
पर क्या वाकई बदला
बदलने वाला जीवन - रंग।
सरकती तारीखों के साथ
आता है दिसंबर हर साल।
लेकर आता है संग अपने
झूठे -सच्चे वादे हज़ार।
रेसोल्युशन की लिस्ट लंबी सी
कहाँ सच हो पाती है,
खुद को बदलने की बातें,
सिर्फ बातें ही हो पाती हैं।
महामारी ने बदल दिया बहुत कुछ
पर कहाँ बदला सबकुछ
स्वार्थपरता, परोपकार का दिखावा
वही का वही है मानव का छलावा।
आइए, इस साल सच मे बदलें वो
जो सच मे बदलना है।
मानव बने सिर्फ मानव,
बदलें ही जो बदलना है।
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