आखिर क्यों.....माँ ।

आखिर क्यों मैं बड़ी हो गई
तुम्हारी उंगलियां छोड़, खड़ी हो गई।
आखिर क्यों माँ! मैं इतनी बड़ी हो गई।

लड़खड़ाना कहीं आसान था, 
खुद के पैरों पर खड़े होने से,
तुम्हारी गोद मे चलना आसान था,
खुद के पैरों पर चलने से,
आखिर क्यों माँ!
मैं इतनी बड़ी हो गई।

तुम्हारे आँचल में छिपना, आसान था
खुद की पहचान बनाने से,
तुम्हारे  हाथ थाम चलना आसान था 
खुद के कदम बढ़ाने से,
आखिर क्यों माँ!
मैं इतनी बड़ी हो गई।

तुम्हारे आँचल की नींद प्यारी थी
दिन भर की भाग दौड़ से,
तुम्हारी थपकियां सुहानी थी 
दुनिया की चकाचौंध से,
आखिर क्यों माँ!
मैं इतनी बड़ी हो गई।

लड़कपन में इठलाती ही अच्छी थी
नई पीढ़ी को संभालने से,
काश लौट आये वही चुहलबाजी,
जो कहीं आसान थी, समझदार बनने से।
आखिर क्यों माँ!
मैं इतनी बड़ी हो गई।

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