नियती और संवेदना

कहीं जन्म तो कहीं मरण,
कहीं विनाश तो कहीं सृजन।
मानव मन मे ,हैं उल्लास और वेदना।
न जाने क्यों; नियति को नही संवेदना।

सृजन करती स्वयं ही, स्वयं करती नाश
ये प्रकृति है जिसे ,नही बांधता कोई मोह-पाश।
देती है उपहार हमें,  छीन लेती स्वयं ही
नतमस्तक उसके आगे हमसब हैं सिर्फ दीन ही।

कभी मुकुराना, कभी अश्रु बहाना,
मजबूर मानव को यही है करना।
छूट गया वक़्त फिर नहीं आता है,
प्राण-पखेरू जब तक है पिंजरे में 
तभी तक है जीवन का ताना-बाना।

हर क्षण को दामन में बटोर लेना
क्योंकि नियति को नही है संवेदना।


🙏

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