परिन्दों का घोंसला
बनाते देखा मैंने परिन्दों को घोंसला
इस जहाँ में उन्हें खुद को सजाते देखा,
तिनको में बटोरे सपने अनोखे
सपनों के लिए उन्हें जागते देखा,
हाँ, परिन्दों को मैंने घोंसला बनाते देखा।
बटोर रहे थे तिनके -तिनके में
ज़िंदगी जीने का हुनर,
न तूफ़ान की फिक्र, न जायदाद का जिक्र,
सिर्फ आशियाना सजाते देखा,
हां, परिन्दों को मैंने ,घोंसला बनाते देखा।
न बुढ़ापे में "वृद्धाश्रम" की जरूरत उन्हें,
न शिल्पकला में कुशलता की चिंता उन्हें,
न "कल"की फिक्र में "आज"को गंवाते देखा,
हर पल को अशियाने में सजाते देखा
हां, परिन्दों को मैंने, घोंसला बनाते देखा।
नन्ही पीढ़ी को घोंसले में संजोया
ना उम्मीद रखी कि ढलती उम्र में
वो सँजोये उन्हें,
उन्हें आसमाँ की ऊंचाइयों पर जाते देखा
लौटकर जमीं के आशियाने पर आते देखा
हां, परिन्दों को घोंसला बनाते देखा ।
चहकते हुए दिन का स्वागत करना और
शाम को चहक कर, लौट आना
न दोस्तों की नाराजगी का डर,
न खूबसूरत ठिकाने का अभिमान करना
सिर्फ प्रकृति से स्नेह और
प्रकृति का मान करते देखा
हाँ, परिन्दों को मैने, घोंसला बनाते देखा।
Comments
Post a Comment