वर्षावतरण

प्यासी अवनी की पुकार पर
अम्बर  मुस्कुरा ही पड़ा,
क्षुधा अवनी की हरने को
मेघ टूट कर बरस ही पड़ा।
नव सृजन हो, प्रकृति निर्मल हो,
इसी आशा में वर्षा का आज,
अवतरण अनायास हो ही पड़ा।
प्रतीक्षारत चातक को
 प्राण रक्षक बूंदे मिली
मोर को नृत्य करने की 
नवीन ऊर्जा पुनः मिली,
हरीतिमा विसरित करने को 
काले मेघ पुनः विचरण करने लगे,
क्यूँ न हम भी बोयें नवल बीज पुनः, 
आशाओं के नवल पौधे रोपित करें।
इस ऋतु में स्वयं को भी सृजित करें,
उत्सुक  मन, और आलोकित चित्त करें,
प्रकृति की अनुकूलता से
 स्वयं को अनुकूल करें,
अपना श्रेष्ठ, सृजन को ही समर्पित करें
अवनी की पुकार सुनी मेघों ने
अंतर्मन की पुकार हम भी सुनें,
स्वयं की तृष्णा हरने को स्वयं ही बरस पड़ें।
स्वत्व का ज्ञान करें और स्वत्व को ही निखार लें।


रुचि




Comments

Popular posts from this blog

नया साल और हम

NATIONAL SCIENCE DAY

गणतंत्र दिवस