छू गई मुझे.......
छू गई एक हवा मुझे
जानी पहचानी मगर अनजानी सी
महफ़िल थी ज़िंदगी, मगर वीरानी सी
गुदगुदा गई "वो" धीमे से,
बहुत कुछ कह गई बिन कहे
पढ़ी हुई एक अनपढी कहानी सी
हँसी थी होंठों पर, पर खनक न थी
रोशनी थी आँखों मे,पर चमक न थी,
बहुत था वक़्त, मगर औरों के लिए,
"वो" खुद से बतियाना सिखा गई
हंसी में खनक, आंखों में चमक दे गई
छू गई एक हवा मुझे
जानी पहचानी मगर अनजानी सी।
मेरी ही परछाई थी
राह ज़िंदगी की दिखा गई
न जाने फिर से उजालो में
कहाँ खो गई,
अनायास मिली वो
अपनी मगर बेगानी सी।
रुचि🙏
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