उफ़! ये महामारी

उफ ! ये क्रूर महामारी 
मानव जाति पे विपदा भारी।
व्याकुल है नर, स्तब्ध नारी।

क्रंदन बन गई आज, किलकारी
वीरान से हैं बाग, जो थे फुलवारी।
कहाँ छिपे हो आप गिरधारी।
उफ! ये क्रूर महामारी।

आरोप-प्रत्यारोप में उलझे ,नेता और नेत्राणि,
प्राणवायु को तरसती,निरीह जनता बेचारी।
उफ! ये क्रूर महामारी।

किसी के लिए है ये निर्दयी दुष्काल
किसी की तिजोरी हो रही मालामाल।
मानव रुदन है सतत जारी।
उफ ! ये क्रूर महामारी।

विद्यार्थी विद्यालय से दूर 
अर्थव्यवस्था चकनाचूर
मानवता न खोना, रहना परस्पर दूर।
कब द्रवित होंगे त्रिपुरारी।
उफ! ये क्रूर महामारी।

मानव-नाश से मन नही भरा था
जो प्राणियों पर भी आई विपदा।
लुप्तप्राय शेरों को भी तुमने
ग्रास बनाया अपनी क्षुधा का।
अब बंद हो कृति यह विनाशकारी
उफ! ये क्रूर महामारी।

प्रोटोकॉल निभाएंगे हम,नही भूलेंगे हद को अपनी,
अब तो दया करो हम पर,हमे  जानो संतान अपनी।
परमपिता करुनानिधान तुम
न बनो अब प्रलयंकारी।
विनती सुन लो,प्रभु  हमारी ।
नष्ट अब हो ये महामारी।


🙏R.A.J.

Comments

Popular posts from this blog

नया साल और हम

NATIONAL SCIENCE DAY

गणतंत्र दिवस