समय और हम
समय और हम, क्या है हमें समझने जैसा
कुछ नहीं, सिर्फ रिश्ता अनोखा सा
उंगलियों पर अपनी,हमें नचाए ये समय
जो चाहे वो करवाये, समय-असमय,
बनाता हमे बंदर, जहान को तमाशा दिखाये
तमाशबीन दुनिया, देखे दूजे को आंखे गड़ाए।
समय का जब समय आये,
इंसान की झोली खुशियों से भर जाए,
जो मुंह फेरने का समय आये,
तो दामन में दुखदायी बादल छाएँ।
समय को समझ लिया जिसने
ज़िंदगी खुशहाल हुई
समय का विरोध किया जिसने
समय के पहिये से तकरार हुई।
ये समय ही तो है, जो
हंसाये, रुलाये, धीमे से गुदगुदा जाय।
स्वयं का रंग दिखाए जब,सब
राजपाट छिन जाय, या फिर
छप्पर फाड़ अमीरी दे जाय।
समय को समझिए, समय ही कर्णधार
उसके अनुसार जो चले, वो ही समझदार।
R.A.J.
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