ममता वही, रूप नया

सुनिए जी! क्यों न माँजी को,
वीकेंड पर घर बुला लाएं,
कुछ काम हैं अधूरे,
उन्हें अब पूरा कर जाएं।

लड़के वाले आ ही रहे हैं,
बिटिया का हाथ मांगने,
कहीं पूछ बैठे दादी कहां है,
तो क्या गांव भेजेंगे मिलाने?

मकान के दस्तवेज़ों पर 
हस्ताक्षर भी है करवाना 
क्यों न एक पंथ दो काज करलें
दोबारा न पड़ेगा बुलवाना।

वह निरीह प्राणी सा बुत बना ,
सहमति जता गया।
अपनी ही योग्यता पर 
प्रश्नचिन्ह लगा गया।
वो तब भी चुप था, 
अब भी चुप ही रह गया।
निःशब्द कदमो से माँ को लेने
गांव की ओर  चला गया।

गांव में जब बूढ़ी निगाहों ने देखा,
कोई आ रहा है, पुनः घर जाने की खबर ला रहा है
कुपित ममता होठों से मुस्काई थी,
हृदय ने शायद कोई योजना बनाई थी।

वह दिन भी आ ही गया,
बिटिया का संबंध जुड़ गया,
"मंगनी की रस्म" सुनियोजित पूर्ण हुई
पुत्रवधु के धैर्य की घड़ी अब सम्पूर्ण हुई।

दस्तवेज़ों के साथ खड़ी वो 
पति को संकेत दिया
हस्ताक्षर करवाने को,
उसके हाथ मे पेन दिया।

मां से कुछ कहता वो बेटा,माँ ने ही चुप्पी को तोड़ा
बेटे के हाथों से उस कागज़ों को लेकर दूसरी ओर छोड़ा। कहा----
मैं हस्ताक्षर न कर पाऊँगी,
भूल हुई जो मुझसे, उसे अब सुधारूँगी।
तेरी पत्नी को बनाना है अलग ठिकाना, 
तो अब जा, अपना बसेरा कहीं और बसाना।
गांव के घर को किराए से दे दिया है,मैंने,
अब इसी घर मे मुझे अपना जीवन है बिताना।
तू अपना बसेरा कहीं और बसाना।

मैं अपने इसी आशियाने में अपना अंत समय बिताउंगी
तेरे पिता के साथ बुना था जो घोंसला
उसे छोड़कर अब कहीं न जाऊंगी।
यहां तेरी किलकारियों, और शरारतों की गूंज है।
जिसके सहारे मैं  अब जी पाऊँगी।
तेरी अर्धांगिनी को तकलीफ है मुझसे
तुम दोनों कहीं और जाओ,
इस जमीन पर मेरे बाद बनेगा एक वृद्धाश्रम,
तुम अपना गृहस्थाश्रम कहीं और बनाओ।
भूल तूने जो किये हैं, मैंने अब तक सुधारा है।, 
 मां हु तेरी,
तेरी गलती मैं अब भी सुधारूँगी।
अर्धांगिनी को तेरी, दे देना थोड़ी ममता
जो आजीवन मैने तुझपर लुटाई है
वो अभागी इससे कदाचित वंचित है,
तभी तो माँ बेटे के बीच अनदेखी दीवार चुनवाई है।

तूने एक रात का वक़्त दिया था 
अपनी गठरी समेटने को,
मै एक पल भी न दे पाऊँगी, 
इसी क्षण छोड़ मेरे आशियाने को ।
मेरे बुढ़ापे में जो उपहार दिया तूने,
वो नाती मेरा तुझे न देगा इसी का 
इंतज़ाम है ये,
शायद अधूरी रही हो ममता मेरी,उसी का
परिणाम है ये।

कोई बात नही, भूल अब सुधार लेंगे,
तू कहीं और जा, हम पुनः अलग होकर
दिन अपने गुज़ार लेंगे।
पिता से छिपा कर जो पैसे तुझे दिया करती थी
उसे सूद समेट मुझे लौटा देना
मर जाऊं तो उन्ही पैसों से एक कफ़न मुझे ओढा देना।
माँ की ममता है ये मेरे बच्चे, हर चूक तेरी सुधारूँगी।
क्या करूँ ,आखिर मां हु तेरी मरकर भी नही
भूल पाऊँगी।



रुचि झा




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