हे वसुधा! अब शांत हो।
हे धरती माँ, क्यों हो इतनी कुपित हमसे,
क्षमा कर दो जो भूल हुई हमसे,
हैं कपूत अति कपटी माँ, पर संतान तुम्हारी माँ
तेरी आँचल है ठिकाना हमारा
क्यों आँचल से दूर कर रही।
मानव की नादानियों पर
इतना क्यों तुम रुष्ट हो रही ।
क्या एक विस्फोट कम था
जो दूसरा विस्फोट लायी हो,
तेरी गोद मे फलने-फूलने को,
तेरा दामन महकाने को,
जो खिली थी नन्ही कलियां
उन्हें अनाथ क्यों कर रही
बिन महके ही खुद की फुलवारी
वीरानों में क्यों बदल रही।
आततायी आतंकों को अब "बस"रहने दो
निर्दोष नन्हे-मुन्नों को उनका जीवन जीने दो
देखे थे जो स्वप्न- सलोने,
उन विद्यार्थियों को उन्हें संजोने दो।
जिनका दोष ही नही 'कोरोना' के लिए
उन मासूमो को अब तो निडर होकर जीने दो।
क्षमा-प्रार्थी है पूर्ण मानव जाती
अब बंद भी हो कोरोना की मनमानी।
इस रौद्र रूप से कोविड के,
कण-कण है यहां भयभीत।
तुम अवनि, तुम वसुंधरा,
अम्बर भी अचंभित यहाँ।
हे धरती माँ! न हो कुपित इतनी हमसे।
क्षमा करो जो भूल हुई हमसे।
Raj,🙏
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